• बालमन को गहरे से टटोलता संग्रह

    बच्चों के लिए लिखना हमें उनके बालमन को गहरे तक टटोलना होता है

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    - पवन चौहान

    बहुत बार माता-पिता बच्चों को सिर्फ पढ़ाई पर ही केन्द्रित रखकर उनकी अन्य खूबियों को नजरअंदाज कर देते हैं। ये वे खूबियां हैं जो उन्हें नेम, फेम के साथ दुनिया में एक खास पहचान दिलवा सकती हैं। उनकी विशेषताओं को भी साथ ही साथ मौक़ा दिया जाना चाहिए। वर्तमान में इसके कई उदाहरण हम रोजाना मीडिया में देखते ही हैं। दूसरी बात, किसी अन्य से हर बात में तुलना करके हम अपने बच्चे को आंकने लगते हैं। बच्चे को डांट-डपट कर उस ओर ले जाने की सोचते हैं जहां उसकी ज़रा भी रूचि नहीं होती। यह डांट-डपट उनके भीतर जो डर और चिड़चिड़ापन पैदा करती है वह उन्हें कभी भी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं करने देती।

    बच्चों के लिए लिखना हमें उनके बालमन को गहरे तक टटोलना होता है। कई बार हम उन्हें बेहद नजदीक होने पर भी समझ नहीं पाते हैं। बाल मनोविज्ञान की इन तहों की गहनता से पड़ताल हम बड़ों को भी बचपन की सैर पर ले जाती है, जहां हम मस्तमौला बने अठखेलियां करते बालमन के कई हठों को निभाते दिखते हैं। 'राह मिल गई' किशोर और बालमन की कहानियों का एक शानदार संगम है। इसकी लेखिका डा0 अमिता दुबे जी हैं जो बालमन की थाह को बहुत संजीदगी से लेती हैं। इस बात का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वे वर्तमान में बच्चों की चर्चित पत्रिका 'बालवाणी' के संपादन से जुड़ी हैं और रोजाना विभिन्न रचनाओं के जरिए बालमनोविज्ञान के कई पक्षों से मुलाक़ात करती हैं।

    संग्रह 'राह मिल गई' में कुल पांच कहानियां संकलित हैं। यह संग्रह बच्चों और बड़ों के उन संवादों का एक खजाना लिए हैं जिनसे हम रोजाना अपने परिवार व समाज के किसी न किसी हिस्से के जरिए जरूर रूबरू होते हैं। यह संवाद हमें अपने से लगते हैं। ये संवाद हमें अपने बच्चों के साथ अन्य बच्चों के बाल मनोविज्ञान को समझने का आधार तैयार करते हैं। ये हमारी रोजाना की बातचीत और उनके किस्सों का एक ताना-बाना है जिसे लेखिका ने बहुत ही सलीके से बुना है। ये संवाद हमें कहानी के साथ आगे बढ़ने में मदद करते हैं। सभी कहानियां पढ़कर साफ़ कहा जा सकता है कि लेखिका स्वयं इन अनुभवों की भुगतभोगी हैं। उन्होंने बहुत बारीकी से इन सभी घटनाक्रमों को कहानी में समायोजित किया है। लेखिका स्वयं लिखती है- 'सभी पांच कहानियां मेरे जीवनानुभव का हिस्सा तो हैं ही, उन संभावनाओं का परिणाम भी है जिनको एक सजग रचनाकार अपने पात्रों के माध्यम से वातावरण सृजित करना चाहता है।'

    बहुत बार माता-पिता बच्चों को सिर्फ पढ़ाई पर ही केन्द्रित रखकर उनकी अन्य खूबियों को नजरअंदाज कर देते हैं। ये वे खूबियां हैं जो उन्हें नेम, फेम के साथ दुनिया में एक खास पहचान दिलवा सकती हैं। उनकी विशेषताओं को भी साथ ही साथ मौक़ा दिया जाना चाहिए। वर्तमान में इसके कई उदाहरण हम रोजाना मीडिया में देखते ही हैं। दूसरी बात, किसी अन्य से हर बात में तुलना करके हम अपने बच्चे को आंकने लगते हैं। बच्चे को डांट-डपट कर उस ओर ले जाने की सोचते हैं जहां उसकी ज़रा भी रूचि नहीं होती। यह डांट-डपट उनके भीतर जो डर और चिड़चिड़ापन पैदा करती है वह उन्हें कभी भी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं करने देती। संग्रह की पहली कहानी 'राह मिल गई' में आभा एक ऐसा ही पात्र है जिसकी बात करते हुए चारों सहेलियां अंशुमा, अंजलि, प्रियंका और मीनाक्षी पढ़ाई, खेल व मनोरंजन के साथ एक खुले वातावरण की चाह लिए, अपने-अपने घरों के व्यवहारिक पक्षों के जरिए माता-पिता की अपेक्षाओं और बच्चों के भीतर के दबाव को समझाती हुई अभिभावक और बच्चों के बीच की मन:स्थिति का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं।

    बहुत बार दूसरों को कम आंकने और नीचा दिखाने के लिए बड़े क्या, बच्चे भी कई हथकंडे अपनाते हैं। ये झूठ बोलकर अपने आपको मात्र झूठी तसल्ली ही देते हैं। बच्चों में विकसित हुई यह आदत उनका नुकसान ही करती है। एक झूठ बोलकर हम मात्र कुछ समय के लिए संतुष्ट तो हो लेते हैं लेकिन हम अपनी सच्चाई से कभी भाग नहीं सकते। वह हमें कहीं न कहीं जरूर पकड़ ही लेती है। कहानी 'संतुष्टि का सपना' का पात्र स्पर्श भी झूठ में ही अपने आप को बहुत रईस माता-पिता का बेटा बताकर अपने सहपाठियों के मध्य अपना दर्जा ऊंचा बनाए रखना चाहता है। उसके भीतर इस उम्र में ही यह ऊंच-नीच व ठगी की भावना का पनपना भविष्य में उसके विश्वसनीय रवैया के प्रति प्रश्नचिन्ह खड़े करता है। जबकि यह उम्र इन झमेलों से दूर किसी और ही मस्ती में होती है। यह तरीका हर्ष को कुछ समय के लिए तो जरुर बड़ा बनाता है लेकिन यह झूठ का पुलिंदा फिर जल्दी ही खुल जाता है।

    बच्चों की बातें बहुत कुछ कहती हैं। उनके मनोभाव, बालमन की जिज्ञासाएं, सपनें, उम्मीदें तथा अपने अपनों का स्नेह, प्यार व अपेक्षाएं उनका रास्ता तलाशने में मदद करती हैं। बच्चों का जितना अनुभव रहता है उसी दायरे में वे भले-बुरे का मर्म समझने लगते हैं। यही वह समय होता है जब हम उन्हें उचित रास्ता बता सकते हैं। कहानी 'समझौते प्यारे-प्यारे' में कमल, विकास, अर्चित और अविरल की अपने-अपने परिवार को लेकर चलने वाली बात अंत में एक सुखद नतीजे पर पहुंच कर बच्चों की कई उलझनों को सुलझाती है।

    शहरीकरण से इतर गांव के अपनेपन, प्यार, सम्मान और रिश्तों की अहमियत आज भी बरकरार है। ज्यादा या कम इस पर बात नहीं करेंगे लेकिन अपनापन वहां अभी भी शेष है। इसी अपनेपन और सम्मान की बात करती है कहानी 'अनोखी छुट्टियां'। कहानी का पात्र क्षितिज पहली बार गांव जा रहा है और वहां जाने को लेकर चिढ़ रहा है। कई ख्यालों में लिपटा वह गांव जाने से अपनी छुट्टियों को गंवाना समझ रहा है। वही क्षितिज जब गांव के लाड-प्यार और अपनेपन को देखता है तो फिर वापिस शहर नहीं जाना चाहता। यह लगाव उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है और कहानी को सुंदर बनाता है।

    एक जिद्दी व लापरवाह लड़की की कहानी है 'तनु बदल गई'। जैसा कि नाम से ही पता चल जाता है कि तनु बाद में बदल जाती है। लेकिन इस बदलाव के पीछे जो मार्मिक घटनाक्रम है वह बहुत शानदार तरीके से लेखिका ने कहानी में प्रस्तुत किया है। कहानी का अंतिम हिस्सा पाठक की आंखें जरूर नम करता है। किसी दुख में नहीं बल्कि उन घटनाओं व छोटी-छोटी बातों से, जो तनु का व्यवहार बदल देते हैं। उसे समझाते हैं कि उसका परिवार उसके खिलाफ नहीं है। भाई के साथ तुलना करके उसे बुरा बताने वाली बातें तनु के भीतर एक गुस्सा और चिड़चिड़ापन पैदा करती है। फिर एक घटना उसके मन और विचारों को ही बदल देती है। यह बहुत सुखद है।
    संग्रह का फॉन्ट पढ़ने को अखरता नहीं है। शामिल रेखाचित्रों से संग्रह और भी आकर्षक बन गया है। ये चित्र पठन को और भी रुचिकर बनाते हैं। 40 पृष्ठों में सजी ये कहानियां निश्चय ही हमें अपने आप से मिलवाती हैं, अपने बच्चों के बालमन की कई परतों के हिस्सों से रूबरू करवाती हैं तथा अभिभावकों व परिवार को उन्हें सही से समझने में मदद करती हैं। बालमनोविज्ञान की चितेरी अमिता दुबे जी को इस संग्रह के लिए खूब बधाई व शुभकामनाएं।

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